Ganesh Chaturthi Vrat Katha | गणेश चतुर्थी व्रत कथा

आज के इस पोस्ट में हम आपको Ganesh Chaturthi Vrat Katha के बारे में बताएंगे। गणेश चतुर्थी का व्रत करने से घर या परिवार पर आयी सारी परेशानियां दूर हो जाती है। भादो महीने में आने वाले संकष्टी चतुर्थी या गणेश चतुर्थी के दिन भगवान् श्री गणेश की पूजा करनी चाहिए।

साथ ही आपको इस दिन गणेश चतुर्थी की व्रत कथा का श्रवण करना चाहिए। इस लेख में हम आपको गणेश चतुर्थी से जुड़ी 4 कथा बताएंगे। तो आईये बिना किसी देरी के शुरू करते है गणेश चतुर्थी व्रत कथा।

Ganesh Chaturthi Vrat Katha

Ganesh Chaturthi Vrat Katha
Ganesh Chaturthi Vrat Katha

(1) Ganesh Chaturthi Vrat Katha

श्री गणेशाय नमः – एक बार देवता कई विपदाओं में घिरे थे। तभी वो लोग मदद मांगने भगवान् शिव के पास गए। उस समय भगवान् शिव के साथ कार्तिकेय और गणेश जी भी साथ बैठे थे। देवताओं की बात सुनकर भगवान् शिव ने कार्तिकेय और गणेश जी से पूछा कि तुम दोनों में से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है। तब कार्तिकेय और गणेश जी, दोनों ने ही इस कार्य के लिए स्वयं को सक्षम बताया। इस पर भगवान् शिव ने दोनों की ही परीक्षा लेने की सोची। भगवान् शिव ने कहा कि तुम दोनों में से सबसे पहले जो भी पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही देवताओं की मदद करने को जाएगा।

भगवान् शिव के मुख से यह बात सुनते ही कार्तिकेय तुरंत अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा करने हेतु निकल गए। परन्तु भगवान् गणेश इस सोच में पड़ गए कि अगर वो अपने वाहन चूहे (मूसक) पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा करने गए तो इसमें काफी समय लग जाएगा। तभी उन्हें एक उपाय सुझा। भगवान् गणेश अपने स्थान से उठे और अपने माता-पिता की परिक्रमा करके वापस अपने स्थान पर बैठ गए।

इधर भगवान् कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटे और स्वयं को विजेता बताने लगे। तभी भगवान् शिव ने गणेश जी से पृथ्वी की परिक्रमा ना करने का कारण पूछा। तब गणेश जी ने कहा कि माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक है। यह सुनकर भगवान् शिव ने गणेश जी को देवताओं के संकट दूर करने कि आज्ञा दी। इस प्रकार भगवान् शिव ने गणेश जी को आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो कोई भी तुम्हारा (गणेश जी) पूजन करेगा और रात्रि में चन्द्रमा को अर्घ देगा, उसके तीनो ताप (यानी देहि ताप, दैविक ताप और भौतिक ताप) दूर होंगे। इस व्रत को करने से व्रतधारी के सभी तरह के दुःख दूर होंगे और उसे जीवन के भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी। चारों तरफ से मनुष्य की सुख समृद्धि बढ़ेगी। पुत्र-पौत्र आदि धन ऐश्वर्या की कमी नहीं रहेगी। तो आइये अब सुनते है दूसरी Ganesh Chaturthi Vrat Katha। श्री गणेशाय नमः।

(2) Ganesh Chaturthi Vrat Katha

श्री गणेशाय नमः – एक समय की बात है राजा हरिश्चंद्र के राज्य में एक कुम्हार रहता था। वह मिटटी के बर्तन बनाता था लेकिन वे कच्चे रह जाते थे। एक पुजारी की सलाह पर उसने इस समस्या को दूर करने के लिए एक बच्चे को मिटटी के बर्तनों के साथ भट्टी में डाल दिया। उस दिन गणेश चतुर्थी का दिन था। उस बच्चे की माँ अपने बेटे के लिए परेशान थी। उसने गणेश जी से अपने बेटे की कुशलता के लिए प्रार्थना की।

दूसरे दिन जब कुम्हार ने सुबह उठकर देखा कि भट्टी में उसके बर्तन तो पक गए थे लेकिन बच्चे का बाल भी बांका नहीं हुआ था। वह दर गया और राजा के दरबार में जाकर सारी घटना बताई। इसके बाद राजा ने उस बच्चे और उसकी माँ को बुलाया। उस माँ ने सभी तरह के विघ्न को दूर करने वाली गणेश चतुर्थी का वर्णन किया। इस घटना के बाद से महिलाऐं संतान और सपरिवार के सौभाग्य के लिए संकष्टी गणेश चतुर्थी का व्रत करने लगी। तो आइये अब सुनते है तीसरी Ganesh Chaturthi Vrat Katha। श्री गणेशाय नमः।

(3) Ganesh Chaturthi Vrat Katha

एक समय की बात है। भगवान् विष्णु का विवाह लक्ष्मी जी के साथ निश्चित हो गया। विवाह की तैयारी होने लगी। सभी देवताओं को निमंत्रण भेजे गए परन्तु गणेश जी को निमंत्रण नहीं दिया। कारण जो भी रहा हो पर अब भगवान् विष्णु के बारात जाने का समय आ गया। सभी देवता अपनी पत्नियों के साथ विवाह समारोह में आ गए। उन सबने देखा कि गणेश जी कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। तब वे लोग आपस में चर्चा करने लगे कि गणेश जी को या तो न्योता नहीं भेजा गया है या फिर वो स्वयं ही विवाह में नहीं आये। सभी को इस बात पर आश्चर्य होने लगा और सबने सोचा कि क्यों ना भगवान् विष्णु से ही इसका कारण पूछा जाए।

विष्णु जी ने बोला कि हमने गणेश जी के पिता भगवान् शिव को न्योता भेजा हुआ है। अगर गणेश जी अपने पिता के साथ आना चाहते है तो आ सकते हैं। अलग से न्योता देने की कोई आवश्यकता भी नहीं थी। दूसरी बात यह है कि उनको सवा मन मूंग, सवा मन चावल, सवा मन घी और सवा मन लड्डू का भोजन दिन-भर में चाहिए। यदि गणेश जी नहीं आएँगे तो कोई बात नहीं क्यूंकि दूसरे के घर जाकर इतना खाना पीना अच्छा भी नहीं लगता। ये वार्ता चल ही रही थी तो किसी एक ने सुझाव दिया कि यदि गणेश जी आ भी जाए तो उनको द्वारपाल बनाकर बैठा देंगे। उनसे बोलेंगे कि आप घर का ख्याल रखना क्यूंकि आप तो चूहे पर बैठकर धीरे-धीरे चलोगे तो बारात से बहुत पीछे ही रह जाओगे। यह सुझाव भी सबको पसंद आया तो भगवान् विष्णु ने भी इसपर अपनी सहमति दे दी।

इतने में गणेश जी भी वहां आ पहुंचे और उन्हें समझा बुझाकर घर की रखवाली करने को बैठा दिया गया। बारात चल दी तब नारद जी ने गणेश जी को द्वार पर बैठा देखा। तब नारद जी ने गणेश जी से पूछा कि वो बारात क्यों नहीं गए? तब गणेश जी ने कहा की भगवान् विष्णु अपना निवास स्थान मुझे सौप कर गए है और अब मैं यहाँ का राजा हूँ। तब नारद जी हंस कर कहने लगे कि ये भी तो हो सकता है कि उन्होंने आपको यहाँ अपना द्वारपाल बनाकर बैठाया हो। तब गणेश जी कहने लगे कि विष्णु भगवान् ने मेरा बहुत अपमान किया है। नारद जी ने कहा की आप निराश ना हो और अपनी मूसक सेना को बारात के आगे भेज दें और उनसे बोले कि रास्ते में गड्ढे खोद दें। ताकि जब बारात वहां से गुजरे तो सब गड्ढे में फस जाए और उनको फिर आपको मदद के लिए बुलाना पड़े।

तभी गणेश जी ने अपनी मूसक सेना आगे भेज दी और गड्ढे खुदवा दिए। जब बारात वहां से निकली तो रथों के पहिये धरती में धंस गयी। लाख कोशिश करने के बाद भी पहिये नहीं निकले। सभी ने अपने-अपने उपाय किये पर फिर भी पहिये नहीं निकले बल्कि इसके बजाय पहिये टूटने लगे। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए, तभी नारद जी ने कहा की आपलोगों ने गणेश जी का अपमान करके अच्छा नहीं किया। यदि आपलोग उन्हें मनाकर लाये तो आपका कार्य सिद्ध हो सकता है और आपका संकट टल सकता है। तभी भगवान् शिव ने अपने दूत नंदी को भेजकर गणेश जी को बुलवाया। गणेश जी का आदर सम्मान के साथ पूजन किया गया और तब रथ के पहिये निकले। पहिये तो निकल गए पर वो टूटे-फूटे थे, तो उन्हें ठीक कौन करे।

पास ही के एक खेत में एक हाथी काम कर रहा था तो उसे बुलाया गया। हाथी अपना कार्य शुरू करने से पहले “श्री गणेशाय नमः” कहकर मन ही मन गणेश जी की वंदना करने लगा। देखते ही देखते हाथी ने सभी पहियों को ठीक कर दिया। फिर हाथी कहने लगा कि “हे देवताओं, आपने सर्वप्रथम गणेश जी को नहीं मनाया होगा और ना ही इनकी पूजन की होगी, इसीलिए तो आपके साथ यह संकट आया है।” फिर हाथी ने कहा, हम तो मूरख अज्ञानी फिर भी पहले गणेश जी को पूजते है, उनका ध्यान करते हैं, आपलोग तो देवतागण है फिर भी आप गणेश जी को कैसे भूल गए। अब आपलोग भगवान् श्री गणेश की जय बोलकर जाएँ तो आपके सब कार्य बन जाएंगे और कोई संकट भी नहीं आएगा। ऐसा कहते हुए हाथी वहां से चल दिए और फिर बारात भी अपने गंतव्य स्थान सकुशल पहुँच गए। फिर विष्णु जी का विवाह सकुशल लक्ष्मी जी के साथ हो गया और कोई विपदा नहीं आयी। हे गणेश जी महाराज, जिस प्रकार आपने भगवान् श्री विष्णु के कार्य सिद्ध किये, उसी प्रकार सबके कार्य सिद्ध करे। तो आइये अब सुनते है चौथी Ganesh Chaturthi Vrat Katha

(4) Ganesh Chaturthi Vrat Katha

एक बार भगवान् शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के किनारे बैठे थे। वहां माता पार्वती ने भगवान् शिव को समय व्यतीत करने के लिए चौपड़ खेल खेलने को कहा। भगवान् शिव तो चौपड़ खेलने को तैयार हो गए परन्तु इस खेल में हार-जीत का फैसला कौन करेगा, यह प्रश्न उनके मन में उठा। तो भगवान् शिव ने कुछ तिनके इकट्ठे करके उसका पुतला बनाकर, उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कर दी। फिर उन्होंने पुतले से कहा, “बेटा हम चौपड़ खेलना चाहते हैं परन्तु हमारी हार जीत का फैसला करने वाला कोई नहीं है। इसीलिए तुम बताना कि हममे से कौन जीता और कौन हारा।” उसके बाद भगवान् शिव और माता पार्वती का चौपड़ खेल शुरू हो गया।

चौपड़ का खेल भगवान् शिव और माता पार्वती के बीच तीन बार खेला गया और संयोग से माता पार्वती तीनो बार जीत गयी। खेल समाप्त होने पर “तिनके के बालक” से हार-जीत का फैसला करने को कहा गया तो बालक ने भगवान् शिव को खेल का विजेता बताया। यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गयीं और क्रोध में उन्होंने बालक को लंगड़ा होने और कीचड़ में रहने का श्राप दे दिया। बालक ने माता पार्वती से मांफी मांगी और कहा कि यह मुझसे अज्ञानतावश हुआ है और मैंने किसी द्वेषभाव से ऐसा नहीं किया है।

बालक द्वारा क्षमा मांगने पर माता पार्वती ने कहा कि यहाँ गणेश पूजन करने के लिए नाग कन्याएं आएंगी। उनके कहे अनुसार तुम गणेश व्रत करो। ऐसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगे। यह कहकर माता पार्वती भगवान् शिव के साथ कैलाश पर्वत चली गयी। एक वर्ष के बाद उस स्थान पर नाग कन्याएं आयीं। तब नाग कन्याओं से व्रत की विधि जानकार उस बालक ने 21 दिन लगातार गणेश जी का व्रत किया। उसकी श्रद्धा से गणेश जी प्रसन्न हुए और बालक को मनोवांछित फल मांगने के लिए कहा। उस बालक ने कहा, “हे विनायक, मुझे इतनी शक्ति दीजिये कि मैं अपने पैरों पर चलकर अपने माता-पिता के पास कैलाश पर्वत पर पहुँच सकूँ और वे यह देखकर प्रसन्न हो। तब बालक को वरदान देकर श्री गणेश अंतर्ध्यान हो गए, जिसके बाद वो बालक कैलाश पर्वत पर पहुँच गया।

कैलाश पर्वत पर पहुँच कर उसने अपनी कथा भगवान् शिव को सुनाई। चौपड़ वाले खेल की वजह से माता पार्वती शिवजी से नाराज थी। अतः भगवान् शिव ने बालक की कथा पार्वती जी को सुनाई कि कैसे इस बालक ने गणेश जी का व्रत करके यहाँ तक पहुंचने में सफल रहा। इस व्रत के प्रभाव से माता पार्वती भी शिव जी और बालक से प्रसन्न हो गयी। तब यह व्रत की विधि भगवान् शिव ने माता पार्वती को बताई और यह सुनकर माता पार्वती के मन में भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा हुई। तब माता पार्वती ने भी 21 दिन तक श्री गणेश का व्रत किया तथा धुर्वा, फल, लड्डू इत्यादि से श्री गणेश का पूजन किया। व्रत के 21वे दिन श्री गणेश ने माता पार्वती के मन की इच्छा पूरी की और कार्तिकेय स्वयं माता पार्वती से मिलने के लिए पहुंचे। गणेश जी का ये व्रत करने से सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। यहीं पर ये Ganesh Chaturthi Vrat Katha भी समाप्त होती है, तो प्रेम से बोलिये श्री गणेशाय नमः।

निष्कर्ष

उम्मीद है आपको मेरा ये लेख Ganesh Chaturthi Vrat Katha | गणेश चतुर्थी व्रत कथा पसंद आया होगा। आपको इस तरह की ढेरों जानकारी देने के लिए ही हमने ये वेबसाइट बनाई है। आप चाहें तो इस वेबसाइट पर मौजूद और भी लेख पढ़ सकते है और अपना ज्ञान बढ़ा सकते है। अगर आपको इस लेख से जुड़ी किसी भी बात को जानने में कोई भी दिक्कत हो तो आप निचे कमेंट में लिखकर हमसे पूछ सकते हैं। धन्यवाद।

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